कोरोना महामारी में अगर सबसे ज्यादा दुख और तकलीफ का सामना करना पडा है तो सिर्फ मजदूर को

मजदूर का कोई धर्म नही होता, मेहनत करना मज़दूरी करना ही उसका धर्म और कर्म है, चाहे जैसा मौसम हो, चाहे वो कितना बीमार हो, उन पर कोई असर नहीं होता वो कोल्हू के बैल की तरह बस दिन रात मेहनत करता है, क्यूकी उसे पता है जिस दिन वो काम नहीं करेगा उस दिन वो, उसके बच्चे और उसका परिवार भूखा ही सोएगा।

इस कोरोना महामारी ने मानो सबसे ज़्यादा संकट इन्ही को दिया है ना काम है ना कुछ, देखा जाए तो कितनी अचंभित बात है की जो मजदूर इमारते और घर बनता हैं वह खुद खुले आसमान मे सोता हैं, जो किसान खेती बाड़ी करता है वह खुद भूखा सोता है, मजदूर चाहे किसी भी श्रेत्र का हो उसकी आर्थिक क्रियाशीलता मे अग्रणी भूमिका होती है, मजदूर के श्रम का सम्मान होना चाहिए, उनकी जीवन दशा मे उनके सुधार की प्रक्रिया होनी चाहिए, कुछ ऐसा हो जिससे उन्हे 12 महीने काम मिलता रहे ताकि उसको दो रोटी का मोहताज ना होना पड़े। राष्ट्र की प्रगती मे महत्वपूण भूमिका निभाने वालो को प्रगती के लाभ से वंचित नही करना चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय‍ श्रम संगठन की तीन संस्‍थाएं हैं

  1. साधारण सम्मेलन/जेनरल कॉन्फ्रेंस।
  2. शासकीय निकाय/गवर्निंग बॉडी।
  3. अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघ के उद्देश्य

  • आई.एल.ओ. सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर श्रमिकों के अधिकारों को बढ़ावा देने के लिए समर्पित है।
  • यह पूरे त्रिपक्षीय यूएन एजेंसी के 187 सदस्य देशों की सरकारों, नियोक्ताओं और श्रमिक प्रतिनिधियों को श्रम मानकों को स्थापित करने, नीतियों को विकसित करने और सभी महिलाओं और पुरुषों के लिए सभ्य काम को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रम तैयार करने के लिए एक साथ लाता है।
  • आज अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघ का मुख्य उद्देश्य संसार के श्रमिक वर्ग की श्रम और आवास संबंधी अवस्थाओं में सुधार लाना तथा पूर्ण रोज़गार का लक्ष्य प्राप्त करने और क्रिया-कलापों को प्रोत्साहित करना है।

इसके द्वारा निम्‍न मुद्दों पर ध्‍यान दिया जाता है

  • काम के घंटों का निर्धारण
  • विश्रामकाल
  • वेतन सहित वार्षिक छुट्टियों की व्‍यवस्‍था
  • अल्पतम मज़दूरी की व्यवस्था
  • समान कामों का समान पारिश्रमिक
  • नौकरी पाने की अल्पतम आयु
  • नौकरी के लिए आवश्यक डॉक्टरी परीक्षा
  • रात के समय कार्य स्‍थल पर स्त्रियों की सुरक्षा
  • औद्योगिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य
  • कार्यकालिक चोट की क्षतिपूर्ति
  • चिकित्सा की व्यवस्था
  • श्रमिकों के संगठित होने और सामूहिक मांग करने का अधिकार आदि।

संगठनो द्वारा बनाए गये नियमो का वैसे तो पालन नही किया जाता लेकिन फिर भी श्रमिकों की स्थिति सुधारने मे इन संगठनो ने एहम भूमिका निभाई हैसबको एक सी सम्मानता दिलाई है।

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