अमेरिकी चुनाव में प्रेसिडेंशियल डिबेट वोटरों पर कितना असर डालती है?

हर देश से चुनाव से जुड़ी खबरें आती ही रहती हैं। एक देश में चुनाव खत्म होता है तो दूसरे देश में शुरू हो जाता है। लेकिन जब अमेरिका में राष्ट्रपति पद(US Election 2020) के लिए चुनाव होता है तो पूरी दुनिया की नजरें उस पर टिक जाती हैं। अमेरिका विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और सबसे मजबूत सैन्य शक्ति भी। अमेरिका में अभी राष्ट्रपति चुनाव चल रहा है। मतदान से पहले यहां वर्तमान राष्ट्रपति और विपक्ष के उम्मीदवार के बीच प्रेसिडेंशियल डिबेट्स (Presidential Debate) का दौर चलता है। इस डिबेट में दोनों पार्टियों के उम्मीदवारों राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर एक विचार विमर्श और बहस करते हैं जिससे देश और दुनिया से संबंधित नीतियों पर दोनों पक्षों के नज़रिये को समझने में मदद मिलती है। पूरी दुनिया इस डिबेट को लाइव देख रही है। इस डिबेट से मतदाता को अपने उम्मीदवार की कमी और ताकत का अंदाजा लगाते हैं। जो वोटर तय नहीं कर पाते कि वोट किसे देना चाहिए, ये डिबेट उन पर मतदाताओं पर सीधा असर डालती है। इसलिए यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि इस डिबेट से जुड़े इतिहास को समझा जाए।

प्रेसिडेंशियल डिबेट का इतिहास क्या है?

अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव से पहले बहस की शुरुआत बहस 26 सितंबर 1960 को हुई थी। तब जॉन एफ केनेडी(John F Kennedy) और रिचर्ड निक्सन(Richard Nixon) के बीच डिबेट हुई थी। इतिहासकार बताते हैं कि टीवी पर प्रसारित हुई इस डिबेट ने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे पर गहरा असर डाला था और मतदाताओं का खासा प्रभावित किया था। फिर 1976 से अमेरिका मेंराष्ट्रपति चुनावों की बहस होना शुरू हो गया। बताया जाता है कि राष्ट्रपति पद के लिए तब गेरोल्ड फोर्ड और जिमी कार्टर के बीच तीखी बहस हुई थी जिसके बादअमेरिका में हवा बदल गई और कार्टर ने बढ़त हासिल कर ली।

इसका स्वरूप क्या है, कैसे होती है ये डिबेट?

हालांकि इस डिबेट का प्रावधान संविधान के तहत अनिवार्य नहीं है लेकिन अब इसे अमेरिकी चुनाव की एक आंतरिक और अहम प्रक्रिया माना जाने लगा है। इस डिबेट की बारी चुनावी प्रक्रिया के अंतिम चरण में आती है। इस डिबेट को एक या कुछ पत्रकार मिलकरसंचालित करते रहे हैं, और कभी-कभी जनता भी उम्मीदवार से सवाल पूछती हैं। जो प्रचलित परंपरा है उसके मुताबित, अमेरिका में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों के बीच तीन बहस होती हैं। एक बहस उपराष्ट्रपतिपद के उम्मीदवारों के बीच होती है। प्रेसिडेंशियल डिबेट बिना किसी विज्ञापन अवरोध के लगातार 90 मिनट तक चलती हैं। डिबेट में विभिन्न मुद्दों पर बात करने के लिए 15 मिनट का समय दिया जाताहै। दोनों उम्मीदवारों को हर सवाल का जवाब देने के लिए 2 मिनट का समय मिलता है।

ये डिबेट वोटरों पर कितना असर डालती है?

अमेरिकी चुनाव में इन डिबेट की क्या अहमिहत है और ये डिबेट्स वोटरों पर कितना असर डालते हैं इसको लेकर राजनीतिक पंडितों और विश्लेषकों की अलग-अलग राय है। कुछ विश्लेषक बताते हैं कि वर्तमान समय में ये डिबेट नीति और सिद्धांतों पर सार्थक तर्क करने की बजाय मत और मतभेद के आधार पर संचालिक होने लगी हैं। विश्लेषकों का ये धड़ा बताता है कि इन डिबेट में वही बातें दोहराई जाती हैं जिन्हें वोटर चुनावी रैलियों में सुन चुके होतें हैं। विश्लेषकों का दूसरा वर्ग मानता है कि चुनाव में किस उम्मीदवार को वोट दिया जाए, यह तय करने के लिए ये डिबेट काफी उपयोगी सिद्ध होती है। डिबेट की वजह से मीडिया इस चुनाव में जीत की तरफ अग्रसर नेता और चुनाव अभियान में पीछे चल रहे उम्मीदवार की छाप बना देता है। साथ ही यह डिबेट उम्मीदवार के नज़रिये को समझने में सहायक सिद्ध होता है।

कैसे अलग है इस बार की डिबेट, कौन मार रहा है बाजी?

इस बार अमेरिकी चुनाव में कोरोना महामारी की वजह से प्रेसिडेंशियल डिबेट का स्वरूप थोड़े अलग तरीके का देखने को मिल रहा है। पहले की तरह डिबेट में ट्रंप और बाइडेन ने न तो आपस मेंहाथ मिलाया और न ही कोहनी से टक्कर मारी। खबरें मिल रही हैं कि इस साल चल रहे अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में रिपब्लिक पाट्री के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप (President Donald Trump) की किरकरी हो रही है और डेमोक्रटिक उम्मीदवार जो बाइडेन(Democratic Presidential nominee Joe Biden) को डिबेट से अच्छी खासी बढ़त मिल रही है।

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